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मध्य प्रदेश परिवहन विभाग में कर चोरी के तरीके

1. बिना परमिट बस का संचालन 

कर चोरी की सबसे पुरानी एवं परंपरागत विधि है बिना परमिट के बस का संचालन करना। पूर्व में ग्रामीण क्षेत्रों की अधिकतर बसें बिना परमिट ही संचालित हुआ करती थी, परंतु धीरे धीरे बढ़ी बसों की संख्या के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में इस प्रकार का संचालन काफी कम हो गया है, हालांकि अब इस प्रकार का अवैध संचालन भारी संख्या में नेशनल हार्इवे में होने लगा है। इसके लिए सरकार की अस्थार्इ अनुज्ञापत्र जारी करने की नीति है साथ ही साथ इसके मूल में विशेष ठेका गाड़ी का परमिट जारी करना है। इस प्रकार का परमिट लेकर भारी संख्या में बसें नागपुर जबलपुर जैसे महत्वपूर्ण मार्ग पर भी संचालित हो रही है।

2. गलत बैठक क्षमता पर हुआ बसों का पंजीकरण

पहले ऐसा होता था कि 1 बस में कुल लगी सीटों की संख्या बस के पंजीकरण की सीटों की संख्या से कुछ अधिक हो। पंरतु अब जबसे स्लीपर बसों का पंजीकरण प्रारंभ हुआ है पूरे प्रदेश में आर.टी.ओ. को एक मुश्त बड़ी रकम की रिश्वत देकर तथा बाद में प्रत्येक माह कुछ रिश्वत देकर आसानी से मध्य प्रदेश में हजारों बस का संचालन हो रहा है इनमें से कुछ उदाहरण स्वरुप हमारी वेबसार्इट पर लिस्ट की गयी हैं। यह सब खुलेआम हो रहा है। इसकी शिकायत करने पर परिवहन विभाग के अधिकारी कोर्इ कदम नही उठाते।

3. स्लीपर बस को साधारण बस में पंजीकरण कराना

मध्य प्रदेश में स्लीपर एवं डीलक्स बसों का साधारण बसों के रुप में हो रहा पंजीकरण भी आम बात है। स्लीपर और डीलक्स बस का स्पयेर टैक्स 250 रुपये प्रति सीट प्रति माह है जबकि साधारण बसों का स्पेयर टैक्स 160 रुपये प्रति सीट प्रति माह है। इसी प्रकार अतिरिक्त सीठ का कर डीलक्स वाहन के लिए 20 रुपये प्रति सीट प्रति 10 किमी है वहीं साधारण बस का अतिरिक्त कर 10 रुपये प्रति सीट प्रति 10 किमी है। यही कारण है कि स्लीपर बसों का रिश्वत देकर भारी संख्या में साधारण बसों के रुप में पंजीकरण हो रहा है।

4. दो स्लीपर को एक स्लीपर में पंजीकरण कराना तथा टू बार्इ टू स्लीपर को वन बार्इ वन स्लीपर में पंजीकरण कराना

मैं अगर यह कहूंं कि मध्य प्रदेश शासन ने जब स्लीपर के लिए कानून बनाया तो उसमें न तो आम जनता की राय को महत्व दिया गया न ही उत्तर प्रदेश, राजस्थान जैसे अन्य राज्यों के प्रावधानों का ही अवलोकन किया गया। कर का निर्धारण करते समय स्लीपर का कर डीलक्स के बराबर ही कर दिया गया जबकि उत्तर प्रदेश तथा राजस्थान जैसे राज्यों में स्लीपर का कर दो डीलक्स सीटों के कर के बराबर ही होता है। यहीं मध्य प्रदेश शासन ने नियम 155 के में स्लीपर की न्युनतम चौड़ार्इ 760 मिमी करने का प्रावधान कर दिया। यह अत्यंत ही अदूरदृषिट भरा कदम था। इसमें इससे अधिक चौड़ार्इ के संबध में कानून मौन है। जबकि वास्तविकता यह है कि टू बार्इ वन स्लीपर में सिंगल स्लीपर की चौड़ार्इ 600 एमएम की है एवं टू स्लीपर की चौड़ार्इ 1200 एमएम है। अब सिथति यह है कि 1200 एमएम वाली स्लीपर भी जिसको की दो लोगों के सोने के लिए बनाया गया है वह भी एक स्लीपर ही काउंट हो रही है तथा 600 एमएम की एक स्लीपर भी एक ही काउंट हो रही है। इन्ही खामियों का लाभ उठाकर बहुत से बस वालों ने टू बार्इ टू स्लीपर बनाना शुरु कर दिया है। इनकी चौड़ार्इ 900 मिमी की होती है। इसमें आसानी से दो लोग सोते हैं। चंकि मध्य प्रदेश नियम 155 क न्यूनतम चौड़ार्इ 750 मिमी की कहता है यही कारण है कि 900 मिमी की दो लोगों की स्लीपर भी पंजीकरण के समय एक ही काउंट होती है। राजस्व को दूसरा नुकसान स्लीपर एवं सीट के कर को बराबर करके भी किया गया है। यही कारण है कि स्लीपर बसों से राज्य को राजस्व की भारी क्षति पहंुंच रही है। एवं सरकार सो रही है एवं परिवहन अधिकारी रिश्वत लेकर जैसी चाहो वैसे बसों का पंजीकरण कर रहे हैं। इस संबध में सरकार को चाहिए कि कानून में संशोधन कर एक स्लीपर की न्युनतम चौड़ार्इ 500 मिमी करे एवं 750 मिमी एक स्लीपर की अधिकतम चौड़ार्इ को किया जाए। 750 मिमी से 1200 मिमी तक के चौड़े स्लीपरों को दो स्लीपर काउंट किया जाए। 1200 मिमी से अधिक चौड़े स्लीपरों को 3 स्लीपर काउंट किया जाए। इसी के साथ एक स्लीपर का कर दो डीलक्स सीटों के बराबर किया जाए।

5. फोल्डींग स्लीपर को फिक्स स्लीपर में काउंट कराना

मध्य प्रदेश सरकार ने स्लीपर का कानून बनाते समय बहुत अधिक समझदारी का परिचय दिया जिसमें नियम 3 ग में खुलने वाली सीटों को अलग अलग सीट गिनने का प्रावधान था परंतु भृष्टाचार के दलदल में समाये परिवहन विभाग जहां कि बाबूओं के घर से 40 - 40 करोण की संपतित मिल रही है वहां कौन सा एैसा आर.टी.ओ. है जो कि इन बसों को पकड़ कर उन्हे उनकी वास्तविक बैठक क्षमता में पंजीकरण करने का काम करेगा। यही कारण है कि तमाम कानून बन जाने के बाद भी एक भी बस को उसकी वास्तविक बैठक क्षमता के अनुरुप आज तक पंजीकरण नही किया जा सका है।

6. मोटर यान अधिनियम की धारा 88(8) का विशेष ठेका परमिट लेकर स्टेज कैरिज के रुप में बस का संचालन

धारा 88(8) में अस्थार्इ ठेका परमिट का प्रावधान किया गया है। कर चोरों के लिए यह कर चोरी का सबसे नायाब और आसान तरीका है। तमाम कर चोर जबलपुर से मुंबर्इ या किसी अन्य स्थान का स्पेशल परमिट उठाते हैं। इस परमिट में पूरा प्रोग्राम की कापी लगी होती है। सामान्यत: यह परमिट जबलपुर से मुंबर्इ तथा वापस एक दिन में ज्यादा से ज्यादा 100 किमी चलना दर्शाया जाता है इस प्रकार यह परमिट कागजों में एक माह में जबलपुर से मुबर्इ पहुंचकर विभिन्न तीर्थ स्थलों का दर्शन करने का होता है। तथा एक माह में वह वापस जबलपुर पहुंचता है। इस परमिट को लेकर रोज बस एक वापसी या एक एकल फेरा स्टेज कैरिज के रुप में एक निशिचत मार्ग पर चलती है। रास्ते में पड़ने वाले थानों को महीने की रिश्वत प्रदान की जाती है। थानों को छोड़कर परिवहन चेक पोस्ट को भी मासिक इन्ट्री प्रदान की जाती है इसके एवज में इनका निर्बाध गति से संचालन होता रहता है। इस प्रकार का परमिट लेकर नागपुर जबलपुर मार्ग पर वर्तमान में लगभग 30 से 50 बसें संचालित हो रही हैं। वहीं इसी प्रकार का परमिट लेकर नागपुर रीवा, नागपुर इलाहाबाद आदी बसें भी चल रही है यह परिवहन विभाग के आला अधिकारियों से लेकर छोटे मोटे कर्मचारियों तक की आय का प्रमुख श्रोत है। यहां से ही राशि सरकार को भी भेजी जाती है।

7. पर्यटक वाहन का स्टेज कैरिज के रुप में उपयोग

केन्दीय मोटर यान नियमावली की धारा 86 में पर्यटक यानों का वर्णन है। ये वाहन मूलत: ठेके पर यात्रियों को ले जाने के उददेश्य से जारी किये जाते हैं परंतु मध्य प्रदेश में इस प्रकार के 50 प्रतिशत से काफी अधिक वाहन यह परमिट लेकर स्टेज कैरिज के रुप में संचालित हो रहे है। 

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